“स्वयं की खोज में निकल”

स्वयं की खोज में निकल,
धर्म की खोज को छोड़ दे,
परमात्मा तू खुद बन,
दूसरे परमात्मा को पूजना छोड़ दे।

अपने भीतर दीप जला,
बाहर का अँधेरा छोड़ दे,
जो खुद में है उसे पहचान,
दूसरों से पूछना छोड़ दे।

मंदिर में क्यों ढूँढ़ रहा,
मस्जिद में क्यों तलाश है,
जिस साँस में जीवन बहता,
वहीं तो उसका वास है।

पत्थर को तू पूजता रहा,
खुद को पत्थर मत होने दे,
जिस चेतन ने तुझको जन्म दिया,
उस चेतन को सोने दे।

स्वयं की खोज में निकल,
धर्म की खोज को छोड़ दे,
परमात्मा तू खुद बन,
दूसरे परमात्मा को पूजना छोड़ दे।

शास्त्रों के शब्द बहुत हैं,
पर सत्य तेरा अपना है,
उधार की आस्था लेकर,
कब तक तू भटकता है?

जो डर तुझे झुकाता है,
उस डर की जंजीरें तोड़ दे,
जो प्रेम तुझे मुक्त करे,
बस उस प्रेम से नाता जोड़ ले।

न हिंदू बन, न मुस्लिम बन,
न नामों में खुद को बाँध,
पहले इंसान बन जा तू,
फिर अपने भीतर झाँक।

धर्म अगर दीवार बने,
उस दीवार को गिरा दे,
प्रेम अगर पहचान बने,
तो प्रेम को ही धर्म बना ले।

तू खुद ही प्रश्न, तू खुद उत्तर,
तू ही अपनी राह है,
तू ही मंदिर, तू ही पूजा,
तू ही अपनी चाह है।

जिसे खोज रहा जन्मों से,
वो तेरे भीतर साँस रहा,
दरवाज़े सारे छोड़ दे,
अब अपने भीतर आ जा।

किसको खोजे बाहर तू,
जब भीतर आकाश है,
जिसे परमात्मा कहता जग,
वो तेरा ही प्रकाश है।

खुद को जान, खुद को पहचान,
अपने सत्य से आँख मिला,
दूसरों के हाथों में क्यों है
अपने जीवन की पतवार भला?

स्वयं की खोज में निकल,
धर्म की खोज को छोड़ दे,
परमात्मा तू खुद बन,
दूसरे परमात्मा को पूजना छोड़ दे।

अपने भीतर दीप जला,
हर झूठा डर तू छोड़ दे,
प्रेम को अपना धर्म बना,
और नफरत से रिश्ता तोड़ दे।

स्वयं की खोज में निकल…
स्वयं की खोज में निकल…
परमात्मा तू खुद बन…
और खुद को पूजना नहीं—खुद को जानना सीख ले।

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