Guardian कौन है — संविधान या कोई व्यक्ति?
एक सवाल Supreme Court से नहीं, हमसे है!
एक वीडियो में मैंने देखा—एक व्यक्ति एक News Anchor के पीछे पड़ा हुआ था कि वह मान ले—
“मोहन भागवत Guardian of the Nation हैं।”
Anchor मना करता रहा।
लेकिन वह व्यक्ति मानने को तैयार नहीं था।
उसके लिए प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं था।
उसका विश्वास ही उसका प्रमाण था।
यही तो अंधभक्ति है।
जब आदमी कहता है—
“मैं मानता हूँ, इसलिए यह सत्य है।”
लेकिन लोकतंत्र कहता है—
“तुम मानते हो, इसलिए यह सत्य नहीं हो जाता।”
यहीं से कहानी राजनीति से निकलकर संविधान के दरवाजे तक पहुँचती है।
क्या Supreme Court भी Guardian है?
हाँ—एक संवैधानिक अर्थ में Supreme Court को संविधान और मौलिक अधिकारों का Guardian/Protector कहा जाता है।
लेकिन जरा ठहरिए।
Guardian का अर्थ मालिक नहीं होता।
Guardian वह है जो किसी चीज की रक्षा करता है।
जिस संविधान की रक्षा Supreme Court करता है, Supreme Court स्वयं भी उसी संविधान से शक्ति प्राप्त करता है।
यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
यहाँ कोई भी संस्था संविधान से ऊपर नहीं है।
न Parliament।
न Executive।
न Judiciary।
और न कोई राजनीतिक या धार्मिक व्यक्ति।
फिर डर किस बात का?
हम अक्सर कहते हैं—
“Court ने कह दिया, अब सवाल मत करो।”
लेकिन मैं पूछता हूँ—
क्यों?
क्या न्यायालय के निर्णय की आलोचना करना अपराध है?
क्या किसी Judgment पर Constitutional debate नहीं हो सकती?
क्या किसी संस्था का सम्मान करने का अर्थ यह है कि हम अपनी बुद्धि भी उसके पास जमा कर दें?
नहीं।
सम्मान रखिए, विवेक मत खोइए।
न्यायपालिका लोकतंत्र की महत्वपूर्ण pillar है।
लेकिन लोकतंत्र में pillars भी संविधान की छत के नीचे खड़े होते हैं।
अंधभक्ति का धर्म एक ही है
राजनीतिक अंधभक्ति कहती है—
“मेरे नेता पर सवाल मत करो।”
धार्मिक अंधभक्ति कहती है—
“मेरी मान्यता पर सवाल मत करो।”
और संस्थागत अंधभक्ति कह सकती है—
“मेरी संस्था पर सवाल मत करो।”
तीनों में एक चीज समान है—
सवाल से डर।
और जहाँ सवाल से डर पैदा हो जाए, वहाँ स्वतंत्र सोच धीरे–धीरे मरने लगती है।
परमात्मा की भाषा में कहें तो मनुष्य को सबसे पहले भीड़ से बाहर निकलकर स्वयं देखना सीखना चाहिए।
क्योंकि भीड़ हमेशा किसी न किसी को Guardian बना देती है।
कभी राजा को।
कभी नेता को।
कभी धर्मगुरु को।
कभी किसी संस्था को।
लेकिन संविधान हमें सिखाता है—
व्यक्ति नहीं, व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
व्यक्ति नहीं, अधिकार महत्वपूर्ण हैं।
व्यक्ति नहीं, संविधान सर्वोच्च है।
असली Guardian कौन?
यह सवाल शायद सबसे महत्वपूर्ण है।
यदि कोई कहे—
“यह व्यक्ति देश का Guardian है।”
तो पूछिए—
“किस कानून के अनुसार?”
यदि कोई कहे—
“इस संस्था से सवाल मत करो।”
तो पूछिए—
“संविधान ने ऐसा कहाँ कहा?”
और यदि कोई कहे—
“मैं मानता हूँ, इसलिए यही सत्य है।”
तो मुस्कुराकर कहिए—
“आपका विश्वास आपका अधिकार है, लेकिन मेरा प्रश्न भी मेरा अधिकार है।”
यही लोकतंत्र है।
Supreme Court भी प्रश्नों से बड़ा नहीं है
Supreme Court का सम्मान इसलिए नहीं होना चाहिए कि वह Supreme Court है।
उसका सम्मान इसलिए होना चाहिए कि वह संविधान के अनुसार न्याय करने वाली संवैधानिक संस्था है।
और यदि कभी उसके किसी निर्णय पर constitutional debate हो, तो उस debate को दबाना नहीं चाहिए।
सवाल न्यायपालिका का अपमान नहीं है।
सवाल लोकतंत्र की साँस है।
हाँ, आलोचना तथ्य, कानून और तर्क पर आधारित होनी चाहिए—न कि व्यक्तिगत अपमान पर।
आखिरी सवाल
शायद हमें यह पूछना बंद करना होगा—
“देश का Guardian कौन है?”
और यह पूछना शुरू करना होगा—
“देश में Guardian की जरूरत क्यों पड़ रही है?”
भारत को किसी एक व्यक्ति के Guardian की जरूरत नहीं है।
भारत को किसी एक विचार के Guardian की जरूरत नहीं है।
भारत को किसी एक संस्था की अंधभक्ति की जरूरत नहीं है।
भारत को चाहिए—
जागता हुआ नागरिक।
स्वतंत्र बुद्धि।
मजबूत संविधान।
और सवाल पूछने का साहस।
क्योंकि जिस दिन नागरिक ने सवाल पूछना छोड़ दिया—
उस दिन Guardian चाहे कोई भी हो,
लोकतंत्र अनाथ हो जाएगा।
और शायद यही सबसे बड़ा व्यंग्य है—
हम Guardian खोजते–खोजते
अपने भीतर के नागरिक को ही भूल गए।
जागिए।
पढ़िए।
संविधान समझिए।
और सवाल पूछिए।
क्योंकि—
देश का असली मालिक कोई व्यक्ति नहीं, संविधान और उसके जागरूक नागरिक हैं।
