समुद्र से प्रार्थना या सामना?
लोग अक्सर कहते हैं—
“आग और पानी के आगे आखिर किसका बस चलता है?”
मनुष्य का चलता है!
हाँ, मनुष्य कभी–कभी प्रकृति के सामने हारता है, लेकिन उसने हार को स्वीकार करना नहीं सीखा। उसने समुद्र को देवता मानकर प्रार्थना करने के बजाय बाँध बनाए, पम्प लगाए और इंजीनियरिंग से समुद्र का सामना किया।
इसका शानदार उदाहरण है नीदरलैंड्स (Netherlands)।
नीदरलैंड्स का लगभग एक–चौथाई भू–भाग समुद्र–स्तर से नीचे है। फिर भी वहाँ के लोगों ने यह नहीं कहा—
“समुद्र देवता नाराज़ हैं, कोई विशेष अनुष्ठान करो।”
उन्होंने कहा—
“समस्या है तो समाधान खोजो।”
बाँध बने, डाइक बने, पम्पिंग सिस्टम बने और ऐसी जल–प्रबंधन व्यवस्था विकसित हुई जिसने दुनिया को दिखाया कि प्रकृति से लड़ाई अंधविश्वास से नहीं, ज्ञान से लड़ी जाती है।
अब ज़रा कल्पना कीजिए—
अगर समुद्र बढ़ने लगे और कोई धर्मगुरु जनता से कहे:
“चिंता मत करो, समुद्र को शांत करने के लिए विशेष पूजा करो।”
तो सवाल होना चाहिए—
“पूजा के बाद पानी कहाँ जाएगा?”
यही वह जगह है जहाँ आस्था और अंधविश्वास के बीच अंतर दिखाई देता है।
आस्था व्यक्ति की निजी अनुभूति हो सकती है;
लेकिन जब कोई व्यक्ति प्राकृतिक समस्या का वैज्ञानिक समाधान छोड़कर जनता को चमत्कार, कर्मकांड या काल्पनिक शक्तियों के भरोसे बैठा दे, तब सवाल पूछना जरूरी है।
दुनिया आगे बढ़ चुकी है।
जहाँ कभी मनुष्य बिजली को देवताओं का क्रोध समझता था, वहाँ आज बिजलीघर हैं।
जहाँ कभी महामारी को दैवी प्रकोप माना जाता था, वहाँ आज अस्पताल और वैक्सीन हैं।
जहाँ समुद्र को अजेय माना जा सकता था, वहाँ इंजीनियरों ने समुद्र के सामने दीवार खड़ी कर दी।
मनुष्य की असली विजय प्रकृति को पूजने में नहीं, उसे समझने में है।
इसलिए मेरा प्रश्न धर्म से भी बड़ा है—
क्या हमें हर समस्या का समाधान किसी अदृश्य शक्ति में ढूँढ़ना है,
या अपने विवेक, विज्ञान और सामूहिक बुद्धि में?
जहाँ सवाल पैदा होते हैं, वहाँ अंधविश्वास कमजोर पड़ता है।
और जहाँ विवेक जागता है, वहाँ मनुष्य खड़ा होता है।
