समानता का अधिकार या सत्ता का विशेषाधिकार?

मनुष्य बड़ा विचित्र है। वह मंदिर में जाकर कहता है—”ईश्वर सबमें समान है।” संविधान कहता है—”सभी नागरिक समान हैं।” नेता चुनाव में कहता है—”मैं सबका हूँ।” लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ में आती है] समानता की मृत्यु हो जाती है।

कानून अंधा है ?

तुमने कभी सोचा है कि इस देश में कानून अंधा है या उसकी आँखों पर बंधी पट्टी के नीचे से उसे कुछ चेहरे साफ़ दिखाई देते हैं]

कानून का चेहरा दो क्यों है?

यदि सड़क पर एक धर्म का जुलूस निकले और पूरा शहर कई दिनों तक जाम रहे] सरकारी संपत्ति टूटे] बच्चों के स्कूल बंद हो जाएँ] अस्पताल पहुँचने वाले मरीज रास्ते में दम तोड़ दें—तो इसे आस्था कहा जाता है। लेकिन यदि दूसरा समुदाय सड़क पर उतर आए तो अचानक कानून जाग जाता है। पुलिस] बैरिकेड और प्रतिबंध दिखाई देने लगते हैं।

मैं किसी धर्म के पक्ष या विपक्ष में नहीं हूँ। मैं केवल इतना पूछता हूँ—कानून का चेहरा दो क्यों है?

कहाँ है समानता का अधिकार?

मनुष्य बड़ा विचित्र है। वह मंदिर में जाकर कहता है—”ईश्वर सबमें समान है।” संविधान कहता है—”सभी नागरिक समान हैं।” नेता चुनाव में कहता है—”मैं सबका हूँ।” लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ में आती है] समानता की मृत्यु हो जाती है।

तुमने कभी सोचा है कि इस देश में कानून अंधा है या उसकी आँखों पर बंधी पट्टी के नीचे से उसे कुछ चेहरे साफ़ दिखाई देते हैं.

नौकर बन जाता है राजा।

सत्य का केवल एक चेहरा होता है। न्याय का भी केवल एक तराजू होता है। जहाँ दो तराजू हों, वहाँ न्याय नहीं, राजनीति होती है।

सबसे दुखद दृश्य बच्चों का है। वे स्कूल जाने के लिए पैदा हुए हैं या नेताओं की असफलताओं की कीमत चुकाने के लिए? शिक्षा रुक जाती है, परीक्षाएँ टल जाती हैं, पूरा जीवन प्रभावित होता है। लेकिन किसी नेता की नींद नहीं टूटती। क्योंकि नेताओं के बच्चे उन स्कूलों में पढ़ते ही कहाँ हैं जहाँ आम आदमी का बच्चा पढ़ता है!

और यह लोकतंत्र भी कितना अद्भुत शब्द है! हर पाँच वर्ष में जनता से कहा जाता है—”आप मालिक हैं।” चुनाव समाप्त होते ही वही मालिक पाँच वर्ष के लिए नौकर बन जाता है और जिसे नौकर चुना था, वह राजा बन बैठता है।

लोकतंत्र की आत्मा कितने में बिकेगी?

आज राजनीति सेवा नहीं रही, एक उद्योग बन गई है। पहले नेता देश के लिए त्याग करते थे, आज देश नेताओं के लिए त्याग कर रहा है। पहले कुर्सी साधन थी, अब वही साध्य बन गई है। विचारधाराएँ बिक रही हैं, विधायक बिक रहे हैं, सांसद बिक रहे हैं। यदि जनप्रतिनिधि बिक सकता है, तो फिर लोकतंत्र की आत्मा कितने में बिकेगी?

संविधान केवल संसद की अलमारी में रखी हुई एक सुंदर पुस्तक नहीं है। संविधान तभी जीवित है जब कानून बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक पर समान रूप से लागू हो। यदि नियम धर्म देखकर बदलते हैं, यदि कार्रवाई चेहरे देखकर होती है, यदि न्याय सत्ता देखकर झुकता है, तो समझ लेना चाहिए कि संविधान अभी जीवित नहीं, केवल साँस ले रहा है।

क्या राज्य का धर्म न्याय है

सवाल यह नहीं है कि कौन-सा धर्म सही है। सवाल यह है कि क्या राज्य का धर्म न्याय है?

जिस दिन भारत का नागरिक यह पूछना बंद कर देगा कि “मेरे धर्म के साथ क्या हुआ?” और यह पूछना शुरू करेगा कि “क्या कानून सब पर समान रूप से लागू हुआ?”, उसी दिन सच्चे लोकतंत्र का जन्म होगा।

समानता भीख नहीं है। यह किसी सरकार की कृपा नहीं है। यह हर नागरिक का जन्मसिद्ध संवैधानिक अधिकार है। और जिस दिन जनता इस अधिकार को पहचान लेगी, उसी दिन सत्ता को भी याद आ जाएगा कि सिंहासन जनता का है, शासक का नहीं।

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