राजनीति — विचार से सत्ता तक

राजनीति — विचार से सत्ता तक

राजनीति कभी एक सोच थी, एक विचार था—सिर्फ सत्ता पाने की चाह नहीं।

एक समय था जब कांग्रेस एक विचारधारा थी, जनसंघ और बाद में भाजपा एक अलग विचारधारा के रूप में सामने आए, बहुजन राजनीति की अपनी विचारधारा थी और वामपंथ की अपनी विचारधारा।

इन सभी विचारधाराओं के मूल में कम-से-कम एक सवाल तो था—

“मैं देश के लिए किस प्रकार कुछ अच्छा कर सकता हूँ?”

लेकिन आज राजनीति में यह सवाल कहीं पीछे छूटता हुआ दिखाई देता है।

आज अनेक नेता किसी न किसी प्रकार सत्ता और पद हासिल करके अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। देश का क्या होगा—यह सवाल अक्सर राजनीतिक शोर में दब जाता है।

80 वर्ष बाद भी सवाल वही है

स्वतंत्रता के लगभग 80 वर्ष बाद भी हमारे देश का गरीब व्यक्ति गरीब क्यों है?

यदि गरीबी इतनी बड़ी समस्या है, तो हमें ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनानी चाहिए जिसमें गरीब व्यक्ति केवल सहायता पाने वाला न रहे, बल्कि पूंजी, शिक्षा, कौशल और अवसर का भागीदार बने?

मैं देश के गरीब आदमी को केवल सहायता की कतार में खड़ा नहीं देखना चाहता।

मैं उसे पूंजीवाद की दौड़ में आगे बढ़ता हुआ, अपने पैरों पर खड़ा और आत्मनिर्भर देखना चाहता हूँ।

मैं देश को फिर जवान देखना चाहता हूँ।

और यदि हम आज भी नहीं जागे, तो दुनिया की तकनीकी और आर्थिक दौड़ में हम बहुत पीछे रह सकते हैं।

दुनिया बदल चुकी है

आज भी बहुत से लोग मानते हैं कि जिस देश की सेना शक्तिशाली है, उस देश पर कोई दूसरा देश आसानी से कब्जा नहीं कर सकता।

लेकिन दुनिया बदल चुकी है।

वह समय सदियों पुराना हो चुका है जब एक राजा दूसरे देश पर हमला करके वहां के लोगों को अपना गुलाम बना लेता था।

आज किसी देश को कमजोर करने के तरीके कहीं अधिक जटिल हैं।

तकनीक, अर्थव्यवस्था, साइबर शक्ति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, शिक्षा, उद्योग और वैश्विक प्रभाव—ये सभी किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति का हिस्सा बन चुके हैं।

इसलिए आने वाले समय में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि हमारे पास कितने सैनिक या कितने हथियार हैं।

हमें यह भी देखना होगा—

हमारे पास कितनी तकनीकी शक्ति है?
हम कितने शिक्षित हैं?
हम कितना उत्पादन करते हैं?
हम कितनी नई तकनीक बनाते हैं?
और हमारे युवा दुनिया के साथ कितनी तेजी से कदम मिला रहे हैं?

दुनिया चांद और अंतरिक्ष की ओर बढ़ रही है

चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियां तकनीक, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और विज्ञान के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रही हैं।

और हमारे देश में भी बहुत बड़ी वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियां हुई हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी राजनीति भी उसी गति से आगे बढ़ रही है?

यदि राजनीति का अधिकांश समय केवल मंदिर-मस्जिद, धर्म और पहचान की बहस में बीत जाएगा, तो विज्ञान, शिक्षा, रोजगार, उद्योग और तकनीक पर उतना ध्यान कौन देगा?

धर्म व्यक्ति की आस्था का विषय हो सकता है।

लेकिन राष्ट्र का भविष्य विज्ञान, शिक्षा, संविधान, कानून, अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्षमता से भी तय होता है।

संविधान हमें क्या सिखाता है?

हमारा संविधान भारत को एक सार्वभौम समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करता है।

भारत में हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है।

लेकिन राज्य की जिम्मेदारी केवल धार्मिक पहचान की रक्षा करना नहीं है।

राज्य की जिम्मेदारी है—

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, न्याय, सुरक्षा, वैज्ञानिक प्रगति और नागरिकों के सम्मानजनक जीवन के अवसर सुनिश्चित करना।

इसलिए हमें यह प्रश्न पूछना चाहिए कि हमारी राजनीति इन मूल राष्ट्रीय उद्देश्यों पर कितनी गंभीरता से चर्चा करती है।

सोचिए—देश कहाँ जा रहा है?

सभी जानते हैं कि आने वाले वर्षों में दुनिया की आर्थिक और तकनीकी शक्ति कुछ बड़ी शक्तियों के आसपास अधिक केंद्रित हो सकती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष तकनीक, रोबोटिक्स, ऊर्जा और जैव-प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में जो देश आगे होंगे, वही आने वाले समय में अधिक प्रभावशाली होंगे।

ऐसे समय में भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन चुनाव जीतेगा।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है—

भारत अगले 25–50 वर्षों में दुनिया में अपनी जगह कैसे बनाएगा?

इसलिए अगली बार वोट देने से पहले…

किसी भी राजनीतिक दल या उम्मीदवार को केवल इस आधार पर मत देखिए कि उसने कितने मंदिर बनाए, कितनी मस्जिदों को लेकर राजनीति की, किस धर्म की बात की या किस पहचान को सबसे ज्यादा उभारा।

उसकी विचारधारा और नीतियों को भी देखिए।

देखिए कि वह—

  • शिक्षा के बारे में क्या सोचता है?
  • रोजगार के लिए क्या योजना रखता है?
  • गरीब को आत्मनिर्भर बनाने के लिए क्या करता है?
  • विज्ञान और तकनीक को कितना महत्व देता है?
  • उद्योग और व्यापार के लिए क्या नीति रखता है?
  • संविधान और कानून के प्रति उसका दृष्टिकोण क्या है?
  • युवाओं के भविष्य के लिए उसका विचार क्या है?
  • और भारत को अगले 25–50 वर्षों में दुनिया में कहाँ देखना चाहता है?

मंदिर और मस्जिद हमारी आस्था के विषय हो सकते हैं।
लेकिन राष्ट्र का भविष्य हमारी सोच का विषय होना चाहिए।

अगले चुनाव में वोट देने से पहले व्यक्ति नहीं, केवल चेहरा नहीं, केवल नारा नहीं—

उसकी विचारधारा देखिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि—

“कौन सत्ता में आएगा?”

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि—

“सत्ता में आने वाला भारत को किस दिशा में ले जाना चाहता है?”

देश तभी जवान होगा, जब देश की राजनीति भी जवान होगी—
नई सोच के साथ, विज्ञान के साथ, शिक्षा के साथ, संविधान के साथ और भविष्य की ओर देखकर।

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