भागते रहो… लेकिन पहुँचना कहाँ है?
हम भागे जा रहे हैं।
हमारा समाज भागा जा रहा है।
देश भाग रहा है।
दुनिया भाग रही है।
लेकिन कोई कहीं पहुँच नहीं रहा।
हजारों वर्षों से हम सभी धर्मों के लोग अपने-अपने शास्त्रों को रट रहे हैं, पढ़ रहे हैं, सुन रहे हैं—लेकिन फिर भी पूर्णता तक कोई नहीं पहुँचा।
किसी हिन्दू से पूछिए—मंदिर क्यों जाते हो?
सीधा उत्तर आता है—
“मेरी श्रद्धा है।”
किसी मुसलमान से पूछिए—नमाज़ क्यों पढ़ते हो?
उत्तर आता है—
“हमारे धार्मिक ग्रंथ कुरान में लिखा है।”
लेकिन क्या कभी हम बैठकर दो क्षण यह सोचते हैं कि—
अगर वहाँ जाकर हमें शांति मिल ही गई,
तो फिर उसी शांति को छोड़कर वापस अशांति लेने हम क्यों लौट आते हैं?
समय किसके पास है कि कुछ सोचे?
एक कहानी याद आती है…
कहीं पढ़ी थी कि एक बार जंगल में अचानक भगदड़ मच गई।
खरगोश भाग रहे थे।
हिरण भाग रहे थे।
चीतें भाग रहे थे।
भालू, शेर, हाथी—सब भागे जा रहे थे।
सब चिल्ला रहे थे—
“भूकंप आ गया! भागो!”
इसी भागमभाग में एक व्यक्ति ने पूछा—
“क्यों भाग रहे हो?”
सबने आगे भागते हुए किसी दूसरे की ओर इशारा कर दिया।
वह व्यक्ति भी उनके साथ भागने लगा।
भागते-भागते शाम हो गई।
तब सबसे आगे भागता हुआ एक खरगोश मिला।
उससे पूछा गया—
“तुम क्यों भाग रहे हो?”
खरगोश बोला—
“आसमान टूट गया है! सब मर जाएंगे!”
उस व्यक्ति ने पूछा—
“तुम्हें कैसे पता चला कि आसमान टूट गया?”
खरगोश बोला—
“मैं सोया हुआ था। अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। मेरी माँ ने कहा था कि जब भी ऐसा धमाका हो, तो भाग लेना—आसमान टूटने की निशानी है।”
व्यक्ति ने पूछा—
“कहीं वह आम का पेड़ तो नहीं था? कहीं उस पेड़ पर बड़े-बड़े आम तो नहीं लगे थे?”
खरगोश बोला—
“हाँ… आम का ही पेड़ था।”
बस…
यही कहानी किसी खरगोश की नहीं, हमारी है।
हम भी भाग रहे हैं।
सभी भाग रहे हैं।
शोर मचा रहे हैं—
“भागो! मौत आ रही है!”
लेकिन किसी ने रुककर यह जानने की कोशिश नहीं की कि—
मौत आ कहाँ से रही है?
डर से भागते-भागते जीवन को ही भूल गए
जिससे पूछो—
“तुम्हें कैसे पता कि मौत आ रही है?”
वह आँखें बंद करके कहता है—
“शास्त्रों में लिखा है।”
मौत के डर से हम भाग रहे हैं।
और इस भागने में हमने जीना ही भूल दिया है।
इतना सुंदर जीवन हमारे सामने है,
लेकिन हमें दिखाई ही नहीं देता।
हम भविष्य के डर में वर्तमान खो रहे हैं।
हम स्वर्ग की खोज में पृथ्वी को भूल रहे हैं।
हम मोक्ष की चिंता में जीवन को ही भूल रहे हैं।
हम धर्म की तलाश में जीवन के वास्तविक अर्थ से दूर होते जा रहे हैं।
मैं तुम्हें कोई नया धर्म नहीं दे रहा
मैं बस तुम्हें तुम्हारी पुरानी धारणाओं, पुराने डर, पुराने विचारों और उन विचारधाराओं से थोड़ा बाहर निकालना चाहता हूँ, जिन्होंने तुम्हें जीवन को सीधे देखने से रोक रखा है।
मैं तुम्हें जीवन दिखाना चाहता हूँ।
जीवन को देखो।
उसे महसूस करो।
उसके साथ जीओ।
जिस दिन जीवन समझ में आ गया,
जिस दिन तुमने जीवन को सीधे देख लिया—
वही जागरण है।
बुद्ध का अर्थ क्या है?
“बुद्ध” का अर्थ किसी एक व्यक्ति की पूजा करना मात्र नहीं है।
बुद्ध का अर्थ है—जागा हुआ।
और जागरण किसी धर्म की संपत्ति नहीं है।
बुद्ध का कोई बोध किसी धर्म से लेना-देना नहीं है।
जिस जागरण की बात बुद्ध करते हैं,
उसी जागरण की ओर गीता का प्रज्ञावान और ज्ञानी मनुष्य भी संकेत करता है।
नाम अलग हो सकते हैं।
ग्रंथ अलग हो सकते हैं।
रास्ते अलग हो सकते हैं।
लेकिन जागना किसी एक धर्म की मिल्कियत नहीं है।
आज भी समय है।
अगर उठ सकते हो—उठो।
अगर जाग सकते हो—जागो।
कुछ क्षण रुक जाओ।
दूसरों के पीछे भागना बंद करो।
देखो कि तुम कहाँ जा रहे हो।
किससे डर रहे हो।
किसके कहने पर भाग रहे हो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या तुम सच में जी भी रहे हो?
क्योंकि हो सकता है जिस खतरे से बचने के लिए तुम पूरी जिंदगी भागते रहे,
वह खतरा कभी था ही नहीं।
और जिस जीवन से तुम भागते रहे—
वही जीवन तुम्हारे सामने खड़ा था।
रुको। देखो। जागो।
जीवन का दर्शन करो।
यही जागरण है।
यही बुद्धत्व है।
